आजादी के सिपाहियों को रोटी में खिलाते थे कांच के टुकड़े और कंकड़

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MANOJ KUMARPublish: Aug, 15 2017 11:21:00 (IST)

MISCELLENOUS INDIA

उस समय जमींदारों के खिलाफ बिगुल बजा हुआ था। एक तरफ अंग्रेज तो दूसरी तरफ जमींदारों से लोहा लेना पड़ रहा था।

नई दिल्ली। स्नेहलता वर्मा की मां नारायणीदेवी भी स्वतंत्रता आंदोलन में अपने पति से पीछे नहीं थीं। माता-पिता ही हमेशा से स्नेहलता के प्रेरणा स्त्रोत रहे। उस समय जमींदारों के खिलाफ बिगुल बजा हुआ था। एक तरफ अंग्रेज तो दूसरी तरफ जमींदारों से लोहा लेना पड़ रहा था। जमींदार ने आंदोलन खत्म करने के लिए पिता पिता माणिक्यलाल वर्मा के साथ मुझे भी गिरफ्तार कर जेल में डाला था, जहां पिता को खूब यातनाएं दीं। लोहे के कड़े पर लटका कर मारते तो रोटियों में कांच के टुकड़े व कंकड़ पीस कर खिलाते। आंखों के सामने पिता को यातनाएं पाते देख मन कचोटता था। स्वाधीनता आंदोलन की याद ताजा करते हुए स्वतंत्रता सेनानी स्नेहलता वर्मा ने बताया कि पिता माणिक्यलाल वर्मा ने जमींदारों के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी।

 

शिवशंकर केसरी, सागर (मप्र): झंडे का अपमान किया तो डंडे से पुलिस को मारा
बात 9 अगस्त 1942 की है। मैं स्कूल में पढ़ाई करता था। आजादी के लिए संघर्षरत सभी बड़े नेता इस दिन गिरफ्तार हो गए थे, इसके विरोध में बड़ा जुलूस निकाला गया। इसमें ब्रिटिश पुलिस अधिकारी ने राष्ट्रीय झंडे का अपमान किया। फिर सबने उसी झंडे के डंडे से उसकी पिटाई की।

 

आनंद मोहन माथुर, इंदौर (मप्र): नकली दाढ़ी-मूंछ लगाकर हम छिपते थे अंग्रेजों से
बात 1942 की है। हमारे खिलाफ वारंट निकला था। उज्जैन जाना था, हम नकली दाढ़ी-मूंछ लगाकर ट्रेन में बैठ गए। जैसे ही ट्रेन चली, एक पुलिस वाला पास आकर बैठ गया। फिर मैंने बाथरूम में ही बैठकर पूूरा सफर तय किया।

 

Freedom Fighterपं. चंद्रकांत शुक्ला, रीवा (मप्र): हाथ में तिरंगा ही था बागी की पहचान
1942 में मैं 12 वर्ष का था, फिर भी मुझे शहडोल क्षेत्र में गतिविधियों की जानकारी देने के लिए भेजा गया। शहडोल में 7 अगस्त 1942 को एक सभा बुलाई गई। मैं भी तिरंगा छिपाकर सभा में शामिल हो गया। हमारी ताकत को देख अंग्रेज डर गए और भाग निकले। बाद में हमेें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।

 

गुरबख्श सिंह, श्रीगंगानगर (राजस्थान): सबके लिए आजादी ही बस एक मकसद था
भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त मैं मात्र 10 वर्ष का था। एक बार हम बच्चों ने खेलते वक्त वहां से गुजरने वाले अंग्रेजों को देख हाय-हाय की गाली दी। अंग्रेजों को गुस्सा आ गया और हमें गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में नाबालिग होने की वजह से हमें छोड़ दिया गया। उस समय हमारे लिए आजादी ही मकसद था।

 

केयूर भूषण, रायपुर (छत्तीसगढ़): 3 साल नजरबंद रहे, गोली मारने का था फरमान
89 वर्षीय केयूर भूषण के अंदर देशभक्ति का जज्बा आज भी कूट-कूटकर भरा हुआ है। 1942 के आंदोलन में वे तीन साल तक नजरबंद रहे। हुकूमत ने उन्हें विद्रोह के आरोप में गोली मारने का आदेश दे दिया था, लेकिन इस आदेश को उस समय के रायपुर कलक्टर आरके पाटिल ने मानने से इनकार कर दिया।

 

Freedom Fighterनवाब शाह, श्रीगंगानगर (राजस्थान)एक बार कदम पीछे हटे तो भारत के होकर रह गए

पुरानी अबादी के नवाब शाह को अब भी परिवार की याद सताती है जो वर्ष 1947 में उनसे अलग होकर पाकिस्तान चला गया। नवाब अब लगभग सत्तर वर्ष के हैं। वे बताते हैं कि वे अपनी मां और पिता के साथ यहीं रहे गए जबकि उनके तीन भाई अन्य रिश्तेदारों के साथ पाकिस्तान चले गए। एक बार गए तो एेसे निकले कि फिर लौट आना मुश्किल हो गया। वे बताते हैं कि अब तो यहां से गए भाइयों के भी पोते हो गए, अब उनसे संपर्क भी नहीं होता।

 

वेश बदलकर पहुंचाते थे आजादी के लिए डाक
श्रीमाधोपुर के बालुराम सैनी बताते हैं, 12 वर्ष की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा। जब गांधीजी राजस्थान प्रवास पर जयपुर आए तो उनका भाषण सुन आजाद होने की प्रेरणा मिली। आजादी के प्रचार-प्रसार के लिए मुझे गोपनीय डाक एक से दूसरी जगह पहुंचाने का काम मिला। रात को वेश बदलकर जाना होता था। 1942 में एक बार जब पंजाब के बरनाल गांव में डाक पहुंचाने गया, तो उस दौरान मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद अंग्रेजों ने अजमेर सेन्ट्रल जेल में डाल दिया। दो साल तक लगातार यातना देने के बाद मुझे रिहा किया गया। इसके बाद भी मेरा मनोबल नहीं टूटा और मैंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष जारी रखा। आखिरकार सभी के संघर्ष ने आजादी का तोहफा हासिल कर लिया। सैनी के मुताबिक आज भ्रष्टाचार देश के सामने कड़ी चुनौती है। यदि सही नेता नहीं चुने गए तो आजादी फिर खतरे में आ सकती है।

 

गोवा बाद में बना भारत का हिस्सा
आजादी के बाद पुर्तगाल ने अपने संविधान में संशोधन करके गोवा को अपना हिस्सा घोषित कर दिया था। फिर 19 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने गोवा पर कब्जा करके उसे भारत का हिस्सा बनाया।

 

खिंची भारत-पाक के बीच सीमा
भारत और पाकिस्तान के बीच की विभाजन रेखा 15 अगस्त तक नहीं थी। यह 17 अगस्त को रेडक्लिफ लाइन के रूप में खींची गई।

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