ज़ी-न्यूज़ पत्रकार ने नौकरी से दिया इस्तीफ़ा, हर खबर को मोदी खबर बनाने का दिया जाता था दबाव [VIDEO]

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म पत्रकार अक्सर दूसरों पर सवाल उठाते हैं लेकिन कभी खुद पर नहीं। हम दूसरों की जिम्मेदारी तय करते हैं लेकिन अपनी नहीं। हमें लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है लेकिन क्या हम, हमारी संंस्थाएं, हमारी सोच और हमारी कार्यप्रणाली लोकतांत्रिक है ? ये सवाल सिर्फ मेरे नहीं है, बल्कि हम सभी के हैं। जी-न्यूज़ के पत्रकार विश्व दीपक ने अपनी नौकरी से तंग आकर इस्तीफ़ा दिया। अपने इस्तीफे में पत्रकार ने दीपक ने लिखा उन्होंने मोदी सरकार से तंग आकर यह इस्तीफ़ा दिया है। दीपक ने बताया की जब से मोदी सरकार आई तभी से वे सिर्फ और सिर्फ मोदी की झूठी प्रशंसा वाली ही खबरें लिख रहें हैं।

दीपक ने बताया कि सवाल करना या न करना हर किसी का निजी मामला है लेकिन मेरा मानना है कि जो पर्सनल है वो पॉलिटिकल भी है। एक ऐसा वक्त आता है जब आपको अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों और अपनी राजनीतिक-समाजिक पक्षधरता में से किसी एक पाले में खड़ा होना होता है। मैंने दूसरे को चुना है और अपने संस्थान ZEE NEWS से इन्ही मतभेदों के चलते 19 फरवरी को इस्तीफा दे दिया है।

मेरा इस्तीफा इस देश के लाखों-करोड़ों कन्हैयाओं और जेएनयू के उन दोस्तों को समर्पित है जो अपनी आंखों में सुंदर सपने लिए संघर्ष करते रहे हैं, कुर्बानियां देते रहे हैं.

यह लिखा इस्तीफे में

प्रिय ज़ी-न्यूज़,

एक साल 4 महीने और 4 दिन बाद अब वक्त आ गया है कि में आपसे अलग हो जाऊं। हालांकि ऐसा पहले करना चाहिए थे, लेकिन अब भी नहीं किया तो खुद को कभी माफ़ नहीं कर सकूंगा। आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वो किसी भावावेश, गुस्से या खीज का नतीजा नहीं है, बल्कि एक सुचिंतित बयान है। मैं पत्रकार होने के साथ-साथ उसी देश का एक नागरिक भी हूं जिसके नाम अंधराष्ट्रवादका ज़हर फैलाया जा रहा है और इस देश को गृहयुद्ध की तरफ धकेला जा रहा है। मेरा नफ़रीक़ दायित्व और पेशेवर जिम्मेदारी कहती है कि मैं इस ज़हर को फैलने से रोकूं। मैं जानता हूं की मेरी कोशिश नाव  समुद्र पार करने जैसी है, लेकिन फिर भी में शुरुआत करना चाहता हूं। इसी सोच के तहत JNSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार के बहाने शुरू किए गए अंध राष्ट्रवादी अभियान और उसे बढ़ाने में हमारी भूमिका के विरोध में मैं अपने पद से इस्तीफ़ा देता हूं। मैं चाहता हूं इसे बिना किसी वैयिक्तत्व द्वेष के स्वीकार किया जाए। असल में बाद व्यक्तित्व है भी नहीं। बात पेशेवर जिम्मेदारी की है। सामाजिक दायित्वबोध की है और आखिर में देश प्रेम की भी है। मुझे अफ़सोस के साथ यह कहना पड़ रहा है कि इन तीनों पैमानों पर एक संस्थान के तौर पर तुम, तुमसे जुड़े होने के नाते एक पत्रकार के तौर पर मैं, पिछले एक साल में कई बार फेल हो चुका।

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