जीएसटी के खिलाफ जारी हड़ताल से कपड़ा उद्योग को अब तक करीब 40 हजार करोड़ रु की चपत लग चुकी है

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जीएसटी के लागू होने के बाद से ही कपड़ा व्यापारियों द्वारा जारी अनिश्चितकालीन हड़ताल को एक पखवाड़े से भी ज्यादा का समय बीत चुका है. खबरों की मानें तो इस अंतराल में देशभर के कपड़ा व्यापार को अब तक करीब 40 हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है. अकेले गुजरात की बात की जाए तो वहां इस हड़ताल से अब तक 10 हजार करोड़ के नुकसान की आशंका जताई जा रही है. ट्रांसपोर्ट जैसे अन्य क्षेत्र जो कपड़ा व्यापार से जुड़े हैं उन्हें मिलाकर प्रदेश में यह नुकसान 15 हजार करोड़ तक आंका जा रहा है.

हड़ताल पर गए कपड़ा व्यापारी अभी सिर्फ धागे पर जीएसटी लगाने या कपड़े पर जीएसटी को एक अप्रैल 2019 तक टालने की मांग पर अड़े हैं. देश के कपड़ा उद्योग के प्रमुख केंद्र सूरत में आंदोलन की अगुवाई कर रही टेक्सटाइल संघर्ष समिति के मुताबिक गुजरात के सूरत और अहमदाबाद समेत अन्य जिलों में करीब सात लाख कपड़ा व्यापारी हैं. समिति का कहना है कि जीएसटी के लागू होने से इन व्यापारियों और इनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जुड़े लाखों अन्य लोगों की जीविका पर संकट मंडरा रहा है. जानकारों की मानें तो जीएसटी से पहले चल रही अनिश्चितताओं के चलते जून से ही कपड़ों की बिक्री में भारी गिरावट दर्ज की गयी थी जो अब बिल्कुल रुक सी गयी है.

विरोध कर रहे व्यापारियों का यह भी कहना है कि बड़े कारोबारियों पर जीएसटी और इस हड़ताल का कुछ खास फर्क नहीं पड़ा है, लेकिन उद्योग से जुड़े अन्य दुकानदारों और मजदूरों की आर्थिक हालत नाजुक हो गयी है. जीएसटी के लागू होने से पहले ही सूरत के व्यापारियों का एक प्रतिनिधिमंडल वित्त मंत्री अरुण जेटली, वित्त राज्यमंत्री अरुण मेघवाल और कपड़ा राज्यमंत्री संतोष गंगवार से भी मिला था. लेकिन यह बैठक बेनतीजा रही. आक्रोशित व्यापारियों के मुताबिक सरकार जीएसटी के सरलीकरण का आश्वासन दे रही है लेकिन उन्हें यह मंजूर नहीं. उनका कहना है कि जब तक सरकार उनकी बात नहीं मान लेती वे हड़ताल जारी रखेंगे.’

हालांकि अब इस हड़ताल को लेकर प्रदेश के व्यापारियों के आपसी मतभेद की छोटी-मोटी घटनाएं सामने आने लगी हैं. लेकिन जानकार कहते हैं कि फिलहाल इस विरोध के जल्द खत्म होने के आसार नज़र नहीं आते. टेक्सटाइल संघर्ष समिति के संयोजक ताराचंद कासट के मुताबिक आने वाले दिनों में जीएसटी के विरोध में अहमदाबाद और मुंबई में बड़ी रैलियों का आयोजन किया जाएगा.

विरोध के दिलचस्प तरीके

गुजरात में हड़ताल पर बैठे व्यापारी सिर्फ जुलूस और नारेबाजी से ही सरकार को नहीं घेर रहे बल्कि कवितापाठ और चुटीली टिप्पणियों से भी अपना विरोध जता रहे हैं. जैसे- ‘जीएसटी भी सलमान खान की तरह है. दिल में तो आता है लेकिन समझ में नहीं.’ ऐसे ही शिरडी वाले सांई बाबा की तर्ज पर बना एक अंतरा भी चलन में है, ‘…दिल्ली वाले, मोदी जी सुन लो, आया है दर पे, कपड़ा व्यापारी… भारत से आवाज है आयी, मर जाएंगे सब छोटे व्यापारी, जीएसटी से मुक्त कराओ, कहता है तुमसे कपड़ा व्यापारी…’

केंद्र सरकार से तो नाराजगी, लेकिन प्रधानमंत्री से नहीं

‘चाय से ज्यादा गर्म केतली यानि मिस्टर जेटली.’ बीते गुरुवार को अहमदाबाद में आयोजित एक कवि सम्मेलन में पढ़ी गयी इस कविता ने मानो पूरे आंदोलन का एक दिलचस्प पहलू उजागर किया है. क्योंकि गुजरात में जीएसटी के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन के दौरान अधिकतर व्यापारी जीएसटी के विरोध में हैं, वित्त मंत्री के विरोध में हैं, यहां तक कि सरकार के विरोध में हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में नहीं हैं.

इस बारे में अपने ब्लॉग पर वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार लिखते हैं, ‘विरोध के लिए इस्तेमाल किए जा रहे नारों में भी मोदी का खुलकर विरोध नहीं किया जा रहा है…कहीं मोदी बाबा हैं तो कहीं मोदी प्यारे हैं… कुछ व्यापारियों ने बताया कि वे मोदी के खिलाफ इसलिए नारे नहीं लगा रहे क्योंकि उन्हें मोदी से डर भी लगता है…उन्हें पता है कि चुनाव के बाद सेल टैक्स और आयकर विभाग के दारोगा उनकी क्या गत बना देंगे…’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारेबाजी नहीं करने के पीछे एक दूसरे कारणों का भी जिक्र रवीश कुमार ने अपने लेख में किया है. वे लिखते हैं, ‘कपड़ा व्यापारी मोदी से प्यार करते हैं. वे कई सालों से उनके प्रति समर्पित हैं. उस प्रेम और भक्ति से उनको विच्छेद करना इतना आसान नहीं… नेता जनता में समाहित होता है, यहां जनता ही नेता में समाहित है.’

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