नोटबन्दी और बड़े उद्योगपतियों का कर्ज डूबने से हुई आर्थिक मंदी, आम लोगों से वसूल रही है मोदी सरकार?

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अर्थव्यवस्था के संकट को समझिए, स्लोगन के मर्म को नहीं

पहली तिमाही के नतीजे बताते हैं कि निर्यात में भारी गिरावट है। इस वक्त जीडीपी का यह जितना प्रतिशत है, वो कभी 14 साल पहले हुआ करता था। 2015 से ही निर्यात कम होता जा रहा था। पिछले तीन साल से भारत का निर्यात 24 लाख करोड़ पर ही अटका हुआ है जो कभी 2011-12 में हुआ करता था। निर्यात में स्थिरता के कारण भी भारत की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी है। दुनिया के बाज़ार में निर्यात बढ़ रहा है मगर भारतीय उत्पाद प्रतियोगिता में टिक नहीं पा रहे हैं। इसके कई कारण होते हैं।

नोटबंदी इस बर्बादी का बड़ा कारण है, कोई इसे हेडलाइन के सुर में नहीं कहता, आप बिजनेस अख़बारों के विश्लेषणों को पढ़ेंगे तो चुपके से कहीं किसी कोने में इस अर्थव्यवस्था नाशक का ज़िक्र मिलता है। कीटनाशक की तरह नोटबंदी भी अर्थव्यवस्था नाशक है, जिसका छिड़काव कीट की जगह बीज पर कर दिया गया। विस्तार के लिए बिजनेस स्टैंडर्ड के कृष्ण कांत की रिपोर्ट आप पेज नंबर 8 पर पढ़ सकते हैं। हिन्दी में तो कुछ होता नहीं।

धमेंद्र प्रधान ने कहा है कि दिवाली से पेट्रोलियम प्रोडक्ट के दाम गिरने लगेंगे। उन्हें ये कैसे पता है? क्या दिवाली तक सरकारें उत्पाद शुल्क में कटौती करने वाली हैं, क्या अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल की कीमत और घटने वाली हैं? जब ये नहीं होगा तो दाम कैसे कम हो जाएंगे? इनके रहते दाम किसके इशारे पर बढ़े और वो पैसे कहां कहां गए?

भारतीय स्टेट बैंक ने न्यूनतम बचत राशि को 5000 से घटाकर 3000 कर दिया है। न्यूनतम जमा राशि से कम होने पर जुर्माने की राशि में भी कुछ कमी की गई है। पेंशनभोगी, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के खाताधारकों को बाहर रखा गया है। बैंक यह इसलिए कर रहा है क्योंकि बड़े उद्योगपति पैसे लेकर भाग गए हैं। उनकी भरपाई आम जनता की जेब से पांच रुपये दस रुपये करके वसूली जा रही है। आपका ध्यान इन सब बातों पर न जाए इसलिए राष्ट्रवाद और हिन्दू मुस्लिम टापिक पर ज़ोर ज़ोर से बयान आते हैं।

25 सितंबर को प्रधानमंत्री ने आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन किया। इसकी तारीफ करते हुए बिजनेस स्टैंडर्ड अपने संपादकीय में यह सूचना दे रहा है कि मई 2014 से आर्थिक सलाहकार परिषद का गठन ही नहीं हुआ था। तीन साल तक किसकी सलाह पर अर्थव्यवस्था चल रही थी, विज्ञापन और स्लोगन निर्माताओं की सलाह पर?

अख़बार लिखता है कि यह इसलिए किया गया है ताकि अर्थव्यवस्था के लिए स्टीमुलस पैकेज के कदमों पर राय विचार हो सके। इसका मतलब यह है कि वित्तर मंत्री के बाद अब प्रधानमंत्री भी मान चुके हैं कि अर्थव्यवस्था गंभीर दौर से गुज़र रही है। अभी तक सरकार इंकार करती रही है लेकिन अलग अलग सेक्टरों से आने वाले आंकड़ों के बाद सरकार के पास कोई रास्ता नहीं बचा है।

बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि सरकार ने घटते निजी निवेश और निर्यात की भरपाई के लिए अपना ख़र्च बढ़ाया मगर यह भी काम नहीं किया। इस बीच जीएसटी के कारण करों की वसूली में अनिश्चितता आ गई है। मौजूदा वित्त वर्ष के अप्रैल से जुलाई के बीच वित्तीय घाटा 5 लाख 46 हज़ार करोड़ का हो गया है जबकि अभी पूरा साल बाकी है। इसका मतलब यह है कि सरकार पहले से अपना निवेश बढ़ा रही थी तभी वित्तीय घाटा बढ़ा है।

25 सितंबर के इकोनोमिक टाइम्स में जे पी मार्गन के जहांगीर अज़ीज़ का इंटरव्यू छपा है। जहांगीर का कहना है कि सरकार अपनी तरफ से ख़र्चा तो पहले से कर रही है, यही स्टीमुलस है। इस हिसाब से देखें तो कोई नतीजा नहीं निकला है। वित्तीय घाटा बढ़ने का मतलब ही यही है कि सरकार अपनी तरफ से पैसे डालकर अर्थव्यवस्था में गति पैदा करने की कोशिश कर रही थी। प्राइवेट उपभोग गिर गया है, कोरपोरेट निवेश गिर गया है, निर्यात गिर गया है। एक ही चीज़ बढ़ रही है वो है निवेश। स्टीमुलस आर्थिक पैकज को कहते हैं। जब सरकार आपके कर का पैसा कारपोरेट को धक्का देने के लिए करने लगे तो उसे स्टीमुलस कहते हैं।

जहांगीर का कहना है कि किसी भी स्टीमुलस के असर करने के लिए ज़रूरी है कि उसका आकार बहुत बड़ा हो। इसकी गुंज़ाइश कम लगती है क्योंकि सरकार पहले से ही भारी मात्रा में निवेश कर रही है। जब तक स्टीमुलस वाले प्रोजेक्ट ज़मीन पर उतरते हैं तब तक उसकी ज़रूरत भी ख़त्म हो चुकी होती है। सरकार के पास इस वक्त बहुत कम संभावनाएं बची हैं। जब भी आर्थिक पैकेज से अर्थव्यवस्था को संभालने का प्रयास हुआ है, संकट गहराया ही है।

चूंकि कारपोरेट भी आम व्यापारियों की तरह सरकार से डरता है इसलिए बोल नहीं रहा है। वह घायल अवस्था में है। नौकरियां इसलिए भी जा रही हैं और बढ़ नहीं रही हैं। यह किसी के लिए ख़ुश होने की बात नहीं है। बेरोज़गारों को अभी कुछ दिन और आई टी सेल में खटना होगा, हम जैसे जिन्हें रोज़गार मिला है, उस पर संकट आ सकता है। तीन साल से गिरावट आ रही थी मगर नए नए स्लोगन की कढ़ाई हो रही थी, कढ़ाई से रूमाल सुंदर तो हो जाता है मगर वैसा काम नहीं आता जिसके लिए बना होता है।

आर्थिक संकट के विश्लेषणों से लग रहा है कि सब कुछ अचानक नहीं हुआ है बल्कि नीतियों के कारण होता आ रहा है। नएा ईवेंट और नए स्लोगन से सावधान रहें। मुझे गाली देने से कोई लाभ नहीं होगा, अब मंत्री भी यही बात कर रहे हैं।

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