नई नहीं है मोदी की छात्रों से दुश्मनी, 5 मौके जब नरेंद्र मोदी सरकार से भिड़े यूनिवर्सिटी के छात्र

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बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी, बीएचयू में छेड़छाड़ के ख़िलाफ छात्राओं के गुस्से को ठीक से संबोधित न कर पाने के लिए कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी की आलोचना हो रही है.

त्रिपाठी ने इस मसले पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वह बीएचयू को जेएनयू नहीं बनने देंगे और अपनी यूनिवर्सिटी से राष्ट्रवाद को ख़त्म नहीं होने देंगे.
चूंकि प्रदेश और केंद्र में भाजपा सरकार है और यूनिवर्सिटी के कुलपति कथित तौर पर संघ के क़रीबी और राष्ट्रवाद के समर्थक माने जाते हैं, लिहाज़ा इन प्रदर्शनों को छात्राओं और केंद्र सरकार के टकराव के तौर पर भी देखा जा रहा है.
यह पहला मामला नहीं है, जब मौजूदा केंद्र सरकार और छात्रों के बीच तनाव या टकराव की स्थिति बनी हो. मानव संसाधन विकास मंत्रालय जब स्मृति ईरानी के पास था- तब भी और अब भी विश्वविद्यालय परिसरों से केंद्र का टकराव होता रहा है और उच्च शिक्षा को लेकर सरकार ग़लत वजहों से चर्चा में रही है.

एक नज़र ऐसे ही टकरावों पर:

1. हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी: रोहित वेमुला की ख़ुदकुशी

हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पीएचडी छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या बीते साल की सबसे चर्चित घटनाओं में रही. 17 जनवरी 2016 को उन्होंने एक लंबी चिट्ठी लिखकर ख़ुद को फांसी लगा ली थी. वह अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) से जुड़े थे.

इसे जुलाई 2015 से चले आ रहे विवाद से जोड़कर देखा गया जिसमें उनके ख़िलाफ कथित तौर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उनकी फेलोशिप रोक दी गई थी. एबीवीपी के छात्रों ने भाजपा सांसद बंडारू दत्तात्रेय को लिखित शिकायत दी थी जिसे उन्होंने मानव संसाधन मंत्रालय को बढ़ा दिया. मंत्रालय के कहने पर कार्रवाई करते हुए रोहित समेत पांच छात्रों को होस्टल से निकाल दिया था.
हालांकि रोहित वेमुला ने अपने सुसाइड नोट में किसी को दोषी नहीं ठहराया था, लेकिन छात्रों ने इसे ‘सांस्थानिक हत्या’ माना और इसके लिए सरकार को ही ज़िम्मेदार ठहराया. इसके बाद बड़े स्तर पर पूरे देश में विश्वविद्यालयों के भीतर और बाहर दलितों से भेदभाव के ख़िलाफ प्रदर्शन हुए और सरकार की छवि को नुकसान हुआ.

2. जेएनयू: देशद्रोही होने का सर्टिफ़िकेट

कन्हैया कुमार
9 फ़रवरी 2016 को चरमपंथी करार दिए गए अफ़ज़ल गुरु की फांसी की बरसी पर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एक विरोध मार्च निकाला गया. आरोप लगे कि वहां भारत विरोधी नारेबाज़ी की गई. इस संबंध में कुछ अपुष्ट वीडियो वायरल भी हुए. मामले में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उमर ख़ालिद समेत कुछ और छात्रों को दिल्ली पुलिस ने देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया.
इसके ख़िलाफ प्रदर्शन किए गए. हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया और कैंपस लौटने के बाद कन्हैया कुमार ने सरकार के ख़िलाफ़ एक भाषण दिया जिसका बड़े पैमाने पर नोटिस लिया गया.
इसके बाद सत्ताधारी खेमे के नेता और समर्थक वामपंथी छात्र राजनीति के गढ़ जेएनयू को ‘देशद्रोहियों का अड्डा’ बताने लगे. यहां से सरकार और जेएनयू के छात्र-छात्राओं के बीच टकराव बढ़ा.
पढ़ें: ‘मोदी और राहुल से बड़ी लकीर खींची कन्हैया ने’
जेएनयू में नए वीसी की नियुक्ति के बाद जब सेना के सम्मान के प्रतीक के तौर पर जेएनयू परिसर में टैंक रखे जाने का प्रस्ताव सामने आया तो छात्रों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया. अब भी तमाम मुद्दों पर जेएनयू के छात्र सरकार के ख़िलाफ प्रदर्शन करते रहते हैं और दूसरी तरफ़ से जेएनयू के छात्रों पर भी आरोप लगाए जाते रहे हैं.

3. जादवपुर यूनिवर्सिटी: ‘किस ऑफ़ लव’

5 नवंबर 2014 को कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं ने हाथों में बैनर-पोस्टर लेकर ‘किस ऑफ लव’ रैली निकाली और कोई पांच सौ मीटर दूर स्थित जादवपुर थाने के सामने ही चौराहे पर चुंबन किया.
इस दौरान ‘संघी गुंडे होशियार, तेरे सामने करेंगे प्यार’ जैसे नारे लगाए गए. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से सार्वजनिक स्थान पर चुंबन के विरोध और कोच्चि में हुई घटना के समर्थन में छात्रों ने पहले ही इस रैली का एलान कर दिया था. छात्रों का कहना था कि वे मॉरल पुलिसिंग के ख़िलाफ़ हैं.
इसके बाद प्रदेश भाजपा प्रमुख दिलीप घोष ने पीटीआई से बात करते हुए इस यूनिवर्सिटी को भी ‘देशविरोधी तत्वों का अड्डा’ कह दिया.

4. दिल्ली यूनिवर्सिटी: प्रोफ़ेसरों-पत्रकारों से मारपीट

इसी साल फ़रवरी में दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में जेएनयू छात्र उमर ख़ालिद और शहला राशिद का कार्यक्रम होना था, लेकिन उसे कॉलेज प्रशासन से मंजूरी नहीं मिली.
इसके विरोध में कॉलेज के बाहर आइसा ने विरोध प्रदर्शन किया. आरोप है कि इसी दौरान एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शनकारियों पर हमला किया.

इस हमले में कुछ छात्र, प्रोफेसर और पत्रकारों को भी चोट लगी. शहला राशिद ने दिल्ली पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए और इस तरह प्रदर्शनकारियों पर ऐसे हिंसक हमले को राष्ट्रवादियों के अतिरेक की तरह ही देखा गया.

एबीवीपी का आरोप था कि आइसा के छात्रों ने देशविरोधी नारेबाज़ी की थी और उसके बाद हुई झड़प में एबीवीपी के भी कम से कम दस छात्र घायल हुए.

5. आईआईटी मद्रास: बीफ़ पार्टी और पिटाई

इसी साल मई में ‘पशु बाज़ारों’ और पशु क्रूरता को लेकर केंद्र सरकार ने नए नियम लागू किए थे. पर्यावरण मंत्रालय के नए नियमों के मुताबिक, पशु बाज़ारों से ख़रीदे गए पशुओं को जान से नहीं मारा जा सकता था और इनसे अलग बूचड़खानों के लिए जानवर सीधे पशु फ़ार्म या इन्हें पालने वालों से खरीदे जा सकते थे.

इस फैसले के विरोध में आईआईटी मद्रास में बीफ़ पार्टी बुलाई गई थी. इसके बाद यह पार्टी आयोजित कराने के आरोप में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्कल से जुड़े एक छात्र सूरज को बुरी तरह पीटा गया.

बीफ़ पार्टी के आयोजन के बाद पेरियार स्टडी सर्कल के प्रतिनिधि स्वामीनाथन से बीबीसी ने बात की थी. उनका कहना था, “हममें से बहुत से छात्र किसान परिवारों से हैं. हम गायों-बैलों को पालना जानते हैं. जो नए नियम हैं वो किसानों के ख़िलाफ़ हैं. नए नियम लागू होने से किसान पशु नहीं पाल पाएंगे.” हालांकि इन नियमों पर बाद में हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी.

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