राजस्‍थान उपचुनाव: 3 नहीं 17 सीटों पर हुई बीजेपी की शिकस्‍त, हार से भी ज्‍यादा हैं बुरे हैं ये आंकड़े

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जयपुर। चुनावों में हार-जीत तो लगी रहती है, लेकिन कुछ आंकड़े ऐसे होते हैं जो बताते हैं आने वाली राह और कठिन हो सकती है। राजस्‍थान में 3 सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के हाथों मिली करारी हार से भी ज्‍यादा चिंताजनक बात बीजेपी यह है कि वह जिस तरह हारी? दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी ने अलग-अलग जगहों पर 12 से 21 प्रतिशत वोट गंवा दिए।

बीजेपी को सबसे ज्‍यादा नुकसान अलवर लोकसभा सीट पर हुआ, जहां उसे 2014 लोकसभा चुनाव में मिले 61 प्रतिशत वोटों की तुलना में इस बार सिर्फ 40 प्रतिशत वोट ही मिल सके। उपचुनाव में दो लोकसभा क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाली 16 सीटों के अलाव एक मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर भी वोट डाले गए। इस लिहाज से देखें तो उपचुनाव में कुल 17 सीटों पर वोट डाले गए और बदकिस्‍मती से हर सीट पर कांग्रेस ने बीजेपी को पटखनी दे डाली।

मांडलगढ़ में बीजेपी को 20 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ

मांडलगढ़ में बीजेपी को 20 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ

मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर बीजेपी को 2013 विधानसभा चुनाव में 52 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन उपचुनाव में पार्टी को सिर्फ 32 फीसदी वोट ही मिल सके। इसी प्रकार से अलवर में 21 और अजमेर में पार्टी को 12 फीसदी वोटों का नुकसान उठाना पड़ा।

बढ़ जाएगा सचिन पायलट का कद

बढ़ जाएगा सचिन पायलट का कद

अजमेर सीट पर उपचुनाव के ऐलान के बाद कांग्रेस में जब इस बात पर मंथन चल रहा था कि यहां से किसे टिकट दिया जाए, तब सबसे पहले सचिन पायलट के नाम की चर्चा हुई, जो इस समय कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष भी हैं। राजस्‍थान में होने वाले अगले विधानसभा चुनावों में वह मुख्‍यमंत्री पद के प्रत्‍याशी की रेस में अशोक गहलोत के साथ सचिन पायलट का भी नाम है। ऐसे में पायलट खेमा नहीं चाहता था कि वह इस समय कोई चुनाव लड़े, क्‍योंकि अगर वह हार गए तो विधानसभा चुनाव में सीएम कैंडिडेट के तौर पर प्रोजेक्‍ट किए जाने की उनकी संभावना कम हो जाती। ऐसे में उन्‍होंने सेफ गेम खेला और वह इसमें कामयाब भी रहे। पायलट ने रघु शर्मा को टिकट दिलाया, जिन्‍होंने बीजेपी को अजमेर में मात दे डाली।

आरएसएस और बीजेपी के बीच खींचतान के चलते हुई हार आरएसएस और बीजेपी के बीच खींचतान के चलते हुई हार

उपचुनाव में किसे मैदान में उतारा जाए? बीजेपी में इस बात को लेकर काफी संघर्ष चला बल्कि यूं कहें कि आरएसएस और बीजेपी में मतभेद साफ दिखे तो ज्‍यादा सही होगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वसुंधरा राजे सिंधिया ने जाति का जो कार्ड चला वो सही साबित नहीं हुआ।

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