राजनीति से ‘अपराधियों’ का सफाया करने वाला PM मोदी का बयान भी निकला ‘जुमला’, चुन-चुन के अपराधी नेताओं की ताजपोशी की

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हम जब सत्ता में आयेंगें तो जितने भी दागदार है राजनेता है उनको राजनीति से बाहर करने के लिए हम कानून लायेंगे। उन्हें एक साल के अंदर जेल भेज का रास्ता दिखायेगें और साथ ही ऐसे लोगो पर मुक़दमा दर्ज किया जायेगा और उसे राजनीति से बाहर कर दिया जायेगा। ये शब्द लोकसभा चुनाव के वक़्त चुनाव प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी लड़ रहे नरेंद्र मोदी ने बोले थे।

जो दागदार नेता है सत्ता में आने के बाद एक साल के अंदर जेल भेज देंगे, अब कोई भी बदमाश असेंबली में नहीं बैठेगा, सबको बाहर कर दूंगा दूध का दूध पानी का पानी कर दूंगा चाहे वो मेरी पार्टी के हो या कहीं और किसी और दल के।




नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री (4 मई,साल 2014)

एक साल क्या अब तीन साल होने को आये है ऐसा कुछ होता हुआ तो दिखाई नहीं दिया जिससे ये कहा जा सके हाँ सत्ता मिलने के बाद अपराधिक मामलों में लिप्त नेताओं के खिलाफ कुछ हुआ हो उल्टा मोदी सरकार ने तो अपराधिक मामलों में लिप्त लोगों की ताजपोशी ही कर डाली।

मगर जब सत्ता हाथ में आई तो मोदी सरकार ने इस मामलें ना की सिर्फ यू टर्न लिया बल्कि इस मामलें को याद दिलाने के लिए जब एक याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर सरकार से जब ये पूछा तो मोदी सरकार की तरफ से जवाब आया की हमारे पास पहले से ही ऐसे कानून है जो सक्षम है भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ एक्शन लेने में।

यूटर्न के बाद ताजपोशी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं चुना गया था। मगर जब भारतीय जनता पार्टी बहुमत से सरकार में आई तो अपराधिक मामलों में शामिल राजनेताओं की ताजपोशी तक हो गई।

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चाहे वो खुद मुख्यमंत्री योगी ही क्यों ना हो जिनके ऊपर करीब 20 अपराधिक मामलें दर्ज है। वहीँ उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या पर तो हत्या से लेकर लूट तक के 11 मामलें दर्ज है।

निकाय चुनाव में मेयर पद की उम्मीदवारी लड़ रहे बीजेपी के 8 उम्मीदवार दागदार  

अभी तक पीएम मोदी ने खुद मौजुदा वक़्त की राजनीति में कम से कम अपनी पार्टी से कोई उदाहरण नहीं पेश कर पाए है। जिससे ये कहा जा सके की राजनीति में आरोपी या दागदार नेताओं की कोई जगह पीएम मोदी की पार्टी में तो नहीं है।

बल्कि हुआ इसके उलट हाल के चल रहे उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में मेयर पद के खड़े हुए बीजेपी के 8 उम्मीदवारो का दामन साफ़ नहीं है।

न्यायिक व्यवस्था में फैसला आने में कम से कम 10-15 साल का समय भी लग जाता है। ऐसे में मंत्री ना की सिर्फ अपना कार्यकाल पूरा करता है बल्कि बार बार सरकार में शामिल भी होता रहता है। ऐसे में राजनीति को साफ़ करने का दावा हर बार चुनावी मुद्दों का सिर्फ हिस्सा बनकर रह जाता है।




जैसा की पीएम मोदी ने चुनाव आयोग के सुझाव का ज़िक्र करते हुए कहा था कि उनकी सरकार एक विशेष अदालत की स्थापना कर आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेताओं के मामलों का निपटारा एक साल के निपटारा कर दिया जायेगा।

फिलहाल वैसा कुछ होता नज़र नहीं आया क्या और वादों की तरह ये भी महज एक चुनावी जुमला था? ये सवाल उठना ज़रूरी है और फिलहाल में इसका जवाब मिलना उससे ज्यादा मुश्किल।

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