मोदी सरकार ने बनाया कश्‍मीरी पंडितों के ‘इंसाफ़ का मज़ाक’, बढ़ रहा है समुदाय में आक्रोश

184

सुप्रीम कोर्ट से सोमवार को उम्‍मीद लगाए बैठे कश्‍मीरी पंडितों को काफी निराश होना पड़ा। कश्‍मीर की विशिष्‍ट स्थिति से जुड़े अनुच्‍छेद 35ए को समाप्‍त किए जाने संबंधी चार याचिकाओं पर अदालत ने सुनवाई को आठ सप्‍ताह टाल दिया। ऐसा केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया गया। सरकारी वकील ने इसे छह माह तक टालने का अनुरोध किया था। उनकी दलील थी कि चूंकि कश्‍मीर के मामले में एक सरकारी वार्ताकार नियुक्‍त किया जा चुका है, लिहाजा सुनवाई में वक्‍त लिया जाना चाहिए।

अदालत ने इसी आधार पर सुनवाई को आठ हफ्ते यानी दो करीब दो महीना टाल दिया। इस सुनवाई को लेकर कश्‍मीरी पंडित समुदाय में काफी जिज्ञासा थी। फैसला आते ही सोशल मीडिया पर एक बार फिर इस समुदाय के लोगों की हताशा साफ़ दिखी है। पिछले कुछ दिनों से कश्‍मीरी पंडित केंद्र की सरकार से वैसे भी बहुत नाराज़ हैं। ट्विटर समेत तमाम माध्‍यमों पर इस समुदाय से आने वाली मशहूर हस्तियां केंद्र को लानत भेज रही हैं।

 

यह अपने आप में थोड़ा चौंकाने वाली बात हो सकती है क्‍योंकि परंपरागत रूप से कश्‍मीरी पंडित कश्‍मीर घाटी से अपने विस्‍थापन के लिए कांग्रेस को जिम्‍मेदार मानते आए हैं। भारतीय जनता पार्टी हमेशा ही कश्‍मीरी पंडितों का मुद्दा प्रमुखता से उठाती रही है लिहाजा इस समुदाय का राजनीतिक रुझान भी राष्‍ट्रवादी ताकतों की ओर रहा है।

केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के तीन साल बाद हालांकि कश्‍मीरी पंडित थोड़ा आक्रोशित हैं। इसकी एक वजह तो सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है जिसमें अस्‍सी के दशक में समुदाय के लोगों की हत्‍या के मामले में इंसाफ़ के लिए दूसरी बार दाखिल की गई याचिका को अदालत ने यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि 27 साल बीत चुका है और अब बहुत देर हो चुकी है।

 

बीते दिनों सर्वोच्‍च न्‍यायालय के मुख्‍य न्‍यायाधीश न्‍यायमूर्ति दीपक मिश्रा और डीवाइ चंद्रचूड़ की एक खण्‍डपीठ ने 24 जुलाई को कश्‍मीरी पंडितों की खारिज की गई एक याचिका को चुनौती देती हुई दूसरी याचिका पर बंद कमरे में सुनवाई करते हुए उसे खारिज कर डाला। ”रूट्स इन कश्‍मीर” के बैनर तले कश्‍मीरी पंडितों ने अदालत द्वारा खारिज की गई याचिका को चुनौती दी थी।

 

पुनरीक्षा याचिका में इस संस्‍था ने 1984 के सिख विरोधी दंगे में हत्‍या के 241 मामलों को बंद किए जाने संबंधी एसआइटी के फैसले की जांच संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा था कि अगर 33 साल पहले हुए दंगे को दोबारा खोला जा सकता है तो वे 27 साल पहले हुई कश्‍मीरी पंडितों की हत्‍याओं में जांच की दोबारा मांग क्‍यों नहीं कर सकते। उनका कहना है कि हत्‍या के ऐसे कुल 70 मामलों में अब तक किसी को सज़ा नहीं हुई है।

 

अब यह संस्‍था एक क्‍यूरेटिव पिटीशन दाखिल करने का सोच रही है। क्‍यूरेटिव याचिका पुनरीक्षा याचिका के बाद आखिरी मौका होता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर कश्‍मीरी पंडितों की ओर से भीषण प्रतिक्रियाएं आई हैं। भारतीय जनता पार्टी और राष्‍ट्रवाद के घनघोर समर्थक फिल्‍मकार अशोक पंडित ने ट्विटर पर फैसले के खिलाफ लिखा है। वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता राम जेठमलानी का भी गुस्‍सा सामने आया है। ”रूट्स इन कश्‍मीर” ने सर्वोच्‍च अदालत के फैसले को ”इंसाफ का मज़ाक” करार दिया है।

 

इस बीच कश्‍मीरियों से संवाद करने के लिए आइबी के पूर्व निदेशक दिनेश्‍वर शर्मा की केंद्र सरकार के मध्‍यस्‍थ के तौर पर नियुक्ति को लेकर भी पंडित आक्रोश में हैं। उन्‍हें उम्‍मीद नहीं थी कि भाजपा सरकार जो लगातार अलगाववादियों से संवाद के खिलाफ रही है, अचानक पलटी मार लेगी। अशोक पंडित ने इस पर भी असंतोष जताया है। विद्वान डॉ. डेविड फ्रॉली ने ट्वीट किया है कि हिंदू मंदिरों पर नियंत्रण की कोशिश करने वाली अदालतों के लिए हिंदुओं की जिंदगी अहम नहीं है।

 

इसी बीच दिवाली पर कुलगाम में एक कश्‍मीरी पंडित परिवार पर हुए हमले की खबर ने भी समुदाय को भड़का दिया है। भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार में कश्‍मीर के मामलों के प्रभारी राम माधव ने अब तक इन स्थितियों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

Our Sponsors
Loading...