मोदी के यह कैसे अच्छे दिन: पिछले 3 महीने में हजारों किसान कर्ज से तंग आकर मरे [VIDEO]

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अच्छे दिन कब आएंगे, इसका किसी को कोई अंदाज़ा नहीं है। अब से नहीं बल्कि पिछले कई सालों से आये दिन किसानों के खुदखुशियों के मामले सामने आ रहे हैं। इसका कारण यही है कि किसान फसल बोने के लिए बैंकों से लोन ले लेते है, लेकिन फसल सूखने के कारण वे बैंकों का लोन नहीं चुका पाते जिससे किसानों को मजबूरन खुदखुशी ही करनी पड़ती है।

आंकड़ों के मुताबिक़ सामने आया है कि पिछले तीन महीनों में 600 से ज्यादा किसान खुदखुशी कर चुके हैं। आइए आपको आगे का आंकड़ा भी बताते हैं की कैसे किस महीने, किस वर्ष किसानों ने खुदखुशियां की, किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों पर हेरफेर की शुरुआत छत्तीसगढ़ में 2011 में हुई

राज्य के आंकड़ों के मुताबिक़, 2006 से 2010 के बीच हर साल औसतन 1,555 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं। पश्चिम बंगाल ने भी इसी तरीक़े को 2012 में अपना लिया। इसके बाद दूसरे राज्यों में भी आंकड़ों के हेरफेर का सिलसिला शुरू हो गया। दरअसल किसानों की आत्महत्या राजनीतिक तौर पर नुकसान पहुंचाने वाला मुद्दा बन गया है।

ऐसे में एनसीआरबी के ओर से किसानों की आत्महत्या को नए फ़ॉरमेट में बताने से राज्य सरकारों के लिए किसानों की आत्महत्या को कम करके बताना और आसान हो गया है। जो नई कैटेगरी, सब-कैटेगरी शामिल की गई हैं, वह इस तरह से हैं – भूमि वाले किसान, ठेके पर खेती करने वाले किसान, खेतिहर मज़दूर इत्यादि.


कोई बड़ा बदलाव नहीं

एनसीआरबी के मुताबिक नए सिरे से कोई नया वर्ग नहीं बनाया गया है, बस 19 सालों से प्रकाशित सूची में थोड़ा बदलाव किया गया है।

किसान आत्महत्या: 5 बदतर राज्यों की तस्वीर

खेती-किसानी में स्वरोजगार का वर्ग ऐसा ही एक वर्ग है। पहले कभी खेतिहर मज़दूरों को एनसीआरबी के आंकड़े या फिर कहीं और भी, स्वरोजगार में शामिल नहीं माना गया। दरअसल खेतिहर मज़दूरों की सबसे बड़ी पहचान ही यही है कि उनका स्वरोजगार नहीं है। वे काम की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह तक भटकते रहते हैं।

बहरहाल, नए फॉरमेट का असर 2014 के आंकड़ों पर भी पड़ा है। अखिल भारतीय किसान सभा की उपाध्यक्ष माला रेड्डी कहती हैं, “एनसीआरबी ने 2014 में, ठेके पर खेती करने वालों को खेतिहर मज़दूर मान लिया है।”

ठेके पर खेती करने वाले किसानों के अलावा किसानों की आत्महत्या के नवीनतम आंकड़ों में दूसरी मुश्किलें भी हैं। मसलन “अन्य” वर्ग में आत्महत्या के मामले में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है।

दांव पर विश्वसनीयता
बीते 19 सालों से एनसीआरबी के आंकड़ों से सटीक आंकड़े भले नहीं मिलते हों, लेकिन मोटा मोटी अंदाज़ा मिल जाता था। लेकिन अब यह विश्वसनीयता भी दांव पर है।

सरकार ने किसानों की आत्महत्या को नए सिरे से क्यों वर्गीकृत किया? क्या इन आंकड़ों से सरकार को शर्मसार होना पड़ता था? या फिर सरकार द्वारा एकत्रित आंकड़े ही तस्वीर को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने वाले होते थे?

किसान आत्महत्या: कैसे तैयार होते हैं आंकड़े?

एनसीआरबी का कहना है कि फॉरमेट में बदलाव एक रूटीन प्रक्रिया है। एजेंसी की ओर से कहा गया है, “विभिन्न साझेदारों के अनुरोध को देखते हुए यह एक नियमित प्रक्रिया है।” लेकिन सरकार या किसी दूसरी एजेंसी की ओर से फॉरमेट में बदलाव का कोई आधिकारिक अनुरोध का रिकॉर्ड नहीं मिलता। हालांकि ऐसा लगता है कि एजेंसी ने कृषि मंत्रालय के 2013 के अनुरोध के मुताबिक यह बदलाव किया है। उस वक्त शरद पवार देश के कृषि मंत्री थे।


इस बदलाव के पीछे क्या तर्क हो सकता है – पहले सारी कैटेगरी एक ही जगह थी, तो अब हम सबको अलग अलग करके इसे तर्कसंगत बना रहे हैं। पहले के आंकड़ों में सभी किसान नहीं थे। लेकिन यह तर्क काम नहीं करेगा क्योंकि 2013 के आंकड़ों में खेती किसानी में स्वरोजगार अलग से स्पष्ट था।

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